जनकनंदिनी माता सीता अशोक वाटिका में विराजमान हैं। उनका मन व्यथित है। वे भगवान् श्रीराम का स्मरण करते हुए उन्हीं उन्हीं के चिन्तन में तल्लीन हैं। वाटिका में अनेक पिशाचिनियाँ उनकी पहरेदारी कर रही हैं। उनमें से कुछ पिशाचिनियाँ सीताजी को आश्वस्त कर रही हैं। उनसे सीताजी का कष्ट देखा नहीं जा रहा है। त्रिजटा नामक एक राक्षसी श्रीराम की परम भक्त हैं-
'त्रिजटा नाम राच्छसी एका, रामचरन रति निपुन विवेका।
(श्रीरामचरितमानस सुन्दरकाण्ड दो. १०/१)
एक बार परम दु:खी सीताजी ने त्रिजटा से कहा कि-
त्रिजटा सन बोली कर जोरी।
मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।
तजौ देह करु बेगि उपाई।
दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई।।
आनि काठ रचु चिता बनाई।
मातु अनल पुनि देहि लगाई।।
(श्रीरामचरितमानस सुन्दरकाण्ड दो.क्र. ११/१-३)
श्रीराम के चरणों में परमभक्ति रखने वाली त्रिजटा बड़े स्नेह सिक्त शब्दों में सीता-माता को समझाते हुए कहती हैं-
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी।
अस कहि सो निज भवन सिधारी।।
(श्रीरामचरितमानस सुन्दरकाण्ड दो. ११/६)
उपर्युक्त पंक्तियों में एक दिन सीताजी अत्यधिक व्यथित होकर त्रिजटा से कहती है कि मैं अब यह विरह वेदना सह नहीं सकती हूँ। इसलिए लकड़ियाँ लाकर चिता बना कर उसमें आग लगा दो, जिससे मैं उसमें अपनी जीवन लीला समाप्त कर सकूँ। त्रिजटा एक समझदार परिपक्व राक्षसी थी। उसने सीता माता को आश्वस्त करते हुए कहा कि रात्रि के समय अग्नि नहीं मिल सकेगी। ऐसा कह कर वो अपने घर चली गई।
इसी तारतम्य में एक बार राक्षसराज रावण अशोक वाटिका में सीता माता से प्रणय निवेदन करने के लिए अनेक महिलाओं को लेकर आता है और सीताजी से कहता है-
'बहु बिधि खल सीतहि समुझावा।
साम दान भय भेद देखावा।।
उस दुष्ट राक्षस ने सीताजी को साम, दाम, दण्ड से भयभीत करने का प्रयत्न किया।
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी।
मन्दोदरी आदि सब रानी।।
तव अनुचरीं करऊं पन मोरा।
एक बार बिलोकु मम ओरा।।Ó
(श्रीरामचरितमानस सुन्दरकाण्ड दो. ८/४५-४५)
रावण सुन्दर मुखाकृति वाली सीताजी से कहता है कि मैं मन्दोदरी आदि सभी रानियों को तुम्हारी सेविका बना दूँगा। यह मेरा प्रण है। तुम एक बार मेरी ओर देख लो। तत्काल सीताजी एक घास के तिनके का आश्रय लेकर उसे अपनी आँखों के सामने रख लेती है और श्रीराम का स्मरण करती है-
'तृन धरि ओट कहति वैदेही।
सुमिर अवधपति परम सनेही।।Ó
श्रीरामचरितमानस सुन्दरकाण्ड दोहा ८/६
राक्षसराज रावण को उत्तर देते समय माता सीता अपनी आँखों के सम्मुख तृण रख लेती है। यह दृश्य जिज्ञासु पाठकों के मानस पटल पर सहज ही एक प्रश्न उपस्थित कर देता है, जिसके अनेक कारण हो सकते हैं-
१. सीताजी राक्षसराज रावण तथा स्वयं के मध्य दूरी बनाए रखने के लिए तिनका हाथ में रखती थी।
2. माता सीता द्वारा उठाया गया यह तिनका मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की अर्द्धांगिनी के लिए परपुरुष से चर्चा करते समय मर्यादा की एक सीमा रेखा है।
3. प्राचीन समय में पर पुरुष से चर्चा करते समय लिए जाने वाले घूँघट का प्रतीक है। यह प्रथा कहीं-कहीं भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में वर्तमान में भी प्रचलित है।
4. अनिंद्य सुन्दरी सीताजी जब अशोक वाटिका में विराजित थीं तब मुश्किल से उनकी आयु १८-१९ वर्ष रही होगी। अपने सुन्दर नयन और दैदीप्यमान मुखाकृति को रावण की कुदृष्टि से बचाने के लिए तृण सीमा रेखा के रूप में आवश्यक था।
5. यह तिनका लज्जा के आवरण का प्रतीक एक पर्दे का आभास भी करवाता है।
६. सीता माता इस बात को स्वयं जानती हैं कि लक्ष्मण द्वारा पंचवटी में खींची गई लक्ष्मण रेखा को पार करने का दुस्साहस करके उन्हें आज इतने कष्टों का सामना करना पड़ रहा है। यह तिनका प्रत्येक बार इसी बात का स्मरण दिलाता है कि उन्हें इसी सीमा रेखा में ही रह कर राक्षसराज से चर्चा करना उचित होगा।
तिनके के सम्बन्ध में एक प्रचलित कथा को मैं संक्षिप्त में प्रस्तुत कर रही हूँ। नववधू जब ससुराल में प्रवेश करती है तो उससे घर की रसोई में कुछ मिष्ठान्न बनवाया जाता है। किसी घर में हलवा, किसी में गुलाब जामुन, कहीं पूरण पोळी या नववधू से खीर बनवाई जाती है। सीताजी ने भी खीर बनाई। भोजन करने के लिए दशरथजी आदि पारिवारिक सदस्यों के साथ ऋषि मुनिगण भी बैठे थे। सीताजी भोजन परोस रही थी। सभी प्रेमपूर्वक भोजन ग्रहण कर रहे थे। अचानक ही तेज हवा का झोंका आया और एक तिनका राजा दशरथ की खीर की कटोरी में गिर गया। सीताजी ने कटोरी में गिरे तिनके को देखा। वे उस कटोरी में गिरे तिनके को हाथ की अँगुली डाल कर निकाल तो नहीं सकती थीं। ऐसा करना उचित भी नहीं था। अत: उन्होंने तिनके की ओर क्रोध पूर्ण दृष्टि से देखा, जिससे तिनका भस्म हो गया और उसकी राख बन गई। राजा दशरथ ने यह दृश्य देख लिया और वे नववधू की शक्ति को समझ गए।
भोजन करने के पश्चात् उन्होंने सीताजी को एक कक्ष में बुलवाया और कहा कि मैंने आज आपकी शक्ति को पहिचान लिया है। आप शक्ति स्वरूपा हैं। आपकी क्रोधपूर्ण दृष्टि में इतना तेज था कि तिनका भी भस्म हो गया था। सीताजी अशोक वाटिका में रावण के आने पर हाथ में तिनका इसलिए भी उठाती है कि उन्हें ज्ञात था कि उनकी आँखों की क्रोधाग्नि रावण को भी भस्म करने की शक्ति रखती है। उन्हें यह कार्य करना नहीं है क्योंकि पंचवटी में श्रीरामचन्द्रजी उन्हें कहते हैं हे सीते! हमारा अवतार जिस कार्य के लिए हुआ है उसके प्रारंभ होने का समय अब आ गया है। अत: तुम अब अग्नि में प्रवेश कर जाओ-
'सुनहु प्रिया व्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबिललित नर लीला।
तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा।।
(श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड दो. २३/१३)
राक्षसराज रावण का वध श्रीराम के ही हाथों होना है। अत: वे तृण को आँखों सामने रख कर अपनी मारक दृष्टि के प्रभाव को कम कर देती है। आदि कवि वाल्मीकि भी रामायण में लिखते हैं-
'तृणमन्तरत: कृत्वा प्रत्युवाच शुचिस्मिता।Ó
अर्थात्- तृण को मध्य में रख कर सीताजी (रावण से) पवित्र वाणी में बोलीं।
(वाल्मीकि रामायण ५/२१/३)
अध्यात्म रामायण में भी कहा है-
उवाचाधोमुखी भूत्वा निधाय तृणमन्तरे।
अध्यात्म रामायण ५/२/३१
अर्थात्- तृण को सामने रख कर नीचे मुख करके सीताजी (रावण से) बोलीं।
सीताजी द्वारा हाथ में तिनका रख कर बात करने के सन्दर्भ में हमारे मस्तिष्क में कई विचार आन्दोलित होते हैं। यथा-
रावण मैं तुम्हें तृण के बराबर भी नहीं समझती हूँ। मैं अपनी देह को तृण के समान भस्म कर दूँगी। किन्तु तुम्हारी बात नहीं मानूँगी। मेरे लिए तेरा ऐश्वर्य, तेरी समस्त रानियाँ और स्वयं तू भी इस तिनके के समान है। रावण तू तुच्छ है।
सीताजी विदेह अर्थात् जनकजी की कन्या है। इसीलिए उन्हें वैदेही संज्ञा भी दी जाती है-
'योग मायापि जाता जनकनन्दिनी।
(अध्यात्म रामायण १/४/१८)
अर्थात्- जनकनन्दिनी (सीताजी) योगमाया के रूप में भी उत्पन्न हुईं।
'आदि सक्ति जेही जग उपजाया।
सोइ अवतरिहि मोरि यह माया।
(श्रीरामचरितमानस १/१५१/४)
विदेहजी तीनों लोकों की सम्पत्ति को तृण के समान मानते थे। इसीलिए वैदेहीजी भी रावण की संपूर्ण संपत्ति को तृण के समान समझती है। श्रीराम अवधपति हैं उनका वैभव रावण के वैभव से कई गुना अधिक है। रावण का वैभव खद्योत अर्थात् जुगनू के समान है। श्रीराम का वैभव सूर्य के समान है। सीताजी के लिए रावण तृणवत् है।
कतिपय मनीषियों के मतानुसार सीताजी स्वयं भूमिजा हैं और तृण भी भूमिज है। दोनों की जन्मस्थली भूमि ही है। अत: तृण सीताजी का भाई हुआ। बहिन के संकटकाल में भाई हमेशा उसका साथ निभाता है उसी प्रकार तृण भी समय-समय पर अशोक वाटिका में सीता की रक्षा करता है।
सीताजी ने दोनों कुलों की मर्यादा की रक्षा की है। दोनों कुलों की मर्यादा का पालन करना, उसकी रक्षा करना प्रत्येक संस्कारित भारतीय महिला अपना कर्त्तव्य समझती है फिर सीताजी तो विदेह नंदिनी हैं, जगत् माता हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्रजी की भार्या हैं और साथ ही रघुकुल के प्रसिद्ध राजा श्री दशरथ की कुलवधू हैं। वे महिला जगत् के लिए आदर्श शक्तिस्वरूपा हैं।